दक्षिण का प्रायद्वीपीय पठार

पठार
1. प्राचीनतम चट्टानांे से निर्मित यह प्रायद्वीपीय पठार दक्षिणी महादेष (गोंडवानालैंड) का एक हिस्सा है।
2. मध्यप्रदेष के गोंड क्षेत्र में सर्वप्रथम इस प्रकार की चट्टानों का पता चलने के कारण इन्हें गोंडवाना कहा जाने लगा।
3. अब नाइस (ळदमपेे) व शिष्ट (ैबीपेज) के रूप में बदल चुकी आर्कियन युग की आग्नेय चट्टानों से इस प्रायद्वीपीय पठार का निर्माण हुआ।
4. इसकी यह विशेषता है कि प्री-कैम्ब्रियन काल के बाद से यह कभी पूरे तौर पर समुद्र के नीचे नहीं गया।
5. प्रायद्वीपीय भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण चट्टानों का क्रम इस प्रकार है-1. आर्कियन क्रम की चट्टानें 2. धारवाड़ क्रम की चट्टानें 3. कुड़प्पा क्रम की चट्टानें 4.विन्ध्य क्रम की चट्टानें 5. गोंडवाना क्रम की चट्टानें 6. दक्कन टैªप। यहां हम इन चट्टानों पर क्रमशः बिन्दुवार प्रकाश डाल रहे हैं।

1. आर्कियन क्रम की चट्टानें:
1. लगभग 120 करोड़ वर्ष पूर्व सर्वप्रथम ये चट्टानें ही पृथ्वी के ठंडा होने के फलस्वरूप अस्तित्व में आई। इसलिए इन्हें अति प्राचीनकाल की चट्टानें कहा जाता है। आर्कियन का शाब्दिक अर्थ ही होता है सर्वाधिक प्राचीन ।
2. पृथ्वी की हलचलों के कारण इन शिलाओं का व्यापक कायान्तरण हो चुका है और अब ये चट्टानें अपने मूल स्वरूप में नहीं है।
3. ये चट्टानें जीवाश्महीन होती है। ये रवादार या स्फटिक होती हैं।
4. भारत में बुन्देलखण्ड नाइस एवं बेलारी नाइस जहां इनके प्राचीनतम् स्वरूप हैं, वहीं बंगाल नाइस एवं नीलगिरि नाइस भी इसी प्रकार की चट्टानें हैं।
5. बुन्देलखंड नाइस का विस्तार मुख्यतः उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड मध्यप्रदेश के बघेलखंड सहित तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, राजस्थान एवं महाराष्ट्र में भी है।
6. बंगाल नाइस को सर्वप्रथम बंगाल के मिदनापुर जनपद में चिन्हित किया गया था। इनका विस्तार पूर्वीघाट, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश के नेल्लौर जनपद, तमिलनाडु के सलेम जनपद झारखंड के मानभून जनपद, किमिर पहाड़ियों, सोन घाटी एवं मेघालय के पठार में है।
7. राजस्थान की अरावली पर्वत श्रंृखला में भी ये पाई जाती हैं। ये चट्टानें चेरनोकाइट श्रेणी की घटक हैं।
8. नीलगिरी नाइस चट्टानें मुख्यतः शेवराॅय पहाड़ियों, पालनी पहाड़ियों, नीलगिरि पहाड़ियों, तमिलनाडु के दक्षिणी अरकाॅट, आन्ध्र प्रदेश के लेल्लौर, छत्तीसगढ़, झारखंड, मालाबार, केरल, कर्नाटक तथा उड़ीसा के बालासोर आदि में पाई जाती है।
9. ध्यातव्य है कि भारत की आर्कियन चट्टानें खनिज सम्पदा की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। सोना-चांदी, लोहा, तांबा, मैंगनीज, अभ्रक, जस्ता एवं डोलोमाइट आदि इनमें प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

2. धारवाड़ क्रम की चट्टानेंः-
1. इन चट्टानों की खोज सर्वप्रथम कर्नाटक के धारवाड़ जिले में किए जाने के कारण ये धारवाड़ चट्टानें कहलाईं। ये चट्टानें अत्यधिक धात्विक हैं।
2. ये परतदार चट्टानें हैं, जिनका निर्माण आर्कियन क्रम की प्राथमिक चट्टानों के अपरदन एवं निक्षेपण से हुआ।
3. ये चट्टानें अब रूपांतरित हो चुकि हैं।
4. धारवाड़ क्रम की चट्टानेें मुख्यतः कर्नाटक के धारवाड़ एवं वेल्लारी जनपदों में पाई जाती है तथा तमिलनाडु के नीलगिरी एवं मदुूरई जिलों तक विस्तारित हैं दिल्ली की अरावली पहाड़ियों, मध्यप्रदेश के रीवा व बालाघाट तथा छोटानागपुर पठार के मध्य व पूर्वी हिस्सों में भी इनका विस्तार है। अरावली पहाड़ियों का निर्माण भी धारवाड़ काल में माना जाता है।
5. इनमें मिलने वाले मुख्य खनिज हैं- निकेल, लोहा (लौह अयस्क), टंगस्टन, तांबा, सीसा, मैंगनीज, सोना-चांदी, जस्ता डोलोमाइट एवं अभ्रक। भारत में आर्थिक दृष्टि से इन चट्टानों को सर्वाधिक भौमिकीय महत्व प्राप्त है।
6. इन चट्टानों का विस्तार बिखरे हुए क्षेत्रों में है। इनकी कुछ प्रमुख श्रेणियां हैं-चैम्पियन श्रेणी , चम्पानेर श्रेणी, चिल्पी श्रेणी, क्लोजपेट श्रेणी, लौह अयस्क श्रेणी, खोण्डोलाइट श्रेणी, रियालो श्रेणी, सकोली श्रेणी, एवं सौसर श्रेणी।

3. कुड़प्पा क्रम की चट्टानें:
1. मुख्य रूप् से आन्ध्र प्रदेश के कुड़प्पा जनपद में पाई जाने के कारण्पा ये चट्टानें कुड़प्पा कहलाई। ये प्राचीन अवसादी चट्टानें हैं।
2. इनका स्वरूप अर्ध-चन्द्राकार है।
3. अन्य चट्टानों की तुलना में अभी कम रूपान्तरित हुई इन चट्टानों का निर्माण धारवाड़ क्रम की चट्टानों के अपरदन एवं निक्षेपण से हुआ। हालांकि जीवाश्म का अभाव इनमें भी पाया जाता है।
4. ये चट्टानें मुख्य रूप् से चेयार घाटी, कृष्णाघाटी, नल्लामलाई पहाड़ी क्षेत्र तथा पापाघानी घाटी आदि में पाई जाती हैं।
5. मध्यप्रदेश के ग्वालियर एवं रीवा तथा रीवा तथा छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में भी ये विस्तारित हैं। इनका कुल विस्तार 22000 वर्ग किमी. क्षेत्र में है। मोटाई 6000 मीटर है।
6. इन चट्टानों को जिन दो वर्गों में विभाजित किया गया हैं, वे हैं-निचली कुड़प्पा चट्टानें एवं उपरी कुड़प्पा चट्टानें।
7. इन चट्टानों में पाए जाने वाले मुख्य खनिज हैं-मैंगनीज, संगमरमर, सीसा, लौह अयस्क, टाल्क एवं एस्वस्टस आदि। खनिजों की कम उपलब्धता के कारण इनका आर्थिक महत्व कम है।
8. गोलकुण्डा के हीरे इन चट्टानों की बेसिक लावा भित्तियों से प्राप्त होते हैं।

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