परिक्षाओं में आने वाले 12 सबसे महत्वपूर्ण संविधान संषोधन

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भारत का संविधान इतना लचीला है कि जरूरत पड़ने पर मूलभूत ढांचे को छोडकर कुछ भी बदलाव कुछ भी बदलाव संभव है। यानी संविधान की सर्वोच्चता, इसका धर्मनिरपेक्ष व संघीय चरित्र, राज्य व केन्द्र में शक्ति विभाजन भारत की संप्रभुता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छोड़ कर अन्य परिवर्तन किए जा सकते हैं।
स्ंविधान सभा में नेहरू जी ने कहा था-बदलती आवश्यकताओं के अनुसार भविष्य में संविधान में संशोधन की जरूरत हो सकती है, क्योंकि कोई भी संविधान आने वाली पीढ़ियों को बांध नहीं सकता। दरअसल संविधान में संशोधन संविधान के ही अनुच्छेद 368 के अंतर्गत हो सकता है।इसमें अब तक 103 संशोधन विधेयक पारित हुए हैं। ऐसे में कई बार यह भ्रांति हो जाती है कि संविधान में 124 संशोधन हो चुके हैं। हमारे संविधान को विश्व के सबसे अधिक संशोधित संविधानों में से माना जाता है लेकिन इनमें से अधिकांश संशोधन छोटे-मोटे स्पष्टीकरण वाले ही हैं। जैसे-राज्य का नाम बदलना, भाषाओं को संविधानों की आठवीं अनुसूची में शामिल करना या आरक्षण की समय अवधि बढ़ाना। यहां जानिए बीते 70 बर्षों में हुए 12 महत्वपूर्ण संशोधनों के बारे में………………

1. 7 वां संषोधनः- राज्यों का भाषाई आधार पर पुर्नगठन
1956: इससे भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया। राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट के आधार पर यह संशोधन किया गया।

2. 42 वां संषोधनः- आपातकाल में अधिकार छीने, कर्तव्य बताए
1976: 42 वां संशोधन ऐसा था, जिसके जरिए सरकार ने आपातकाल के दौरान बहुत सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए और न्यायपालिका के अधिकारों में भी कटौती कर दी। तब कई संशोधन तो ऐसे किए गए जो लोकतंत्र की भावना के विरूद्ध थे। फिर आपातकाल समाप्त होने के बाद 43 वें, 44वें संशोधनों के द्वारा उन अधिकांश संशोधनों को समाप्त किया गया, जो 42 वें संशोधन के जरिए लाए गए थें। इसके बावजूद 42 वें संशोधनों की कई ऐसी बातें थाीं, जो जारी रहीं। जैसे संविधान में नागरिकों के मूल कर्तव्यों के संबंध में जो चार (क) भाग जोड़ा गया था, वो नहीं बदला और आज भी कायम है। इसे बहुत महत्वपूर्ण समझाा जाता है, क्येांकि संविधान में मूल अधिकारों का विवेचन तो था लेकिन मूल कर्तव्यों के बारे में कुछ नहीं कहा गया था। मूल कर्तव्यों की बात 42 वें संशोधन से ही संविधान में आई ।इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बदलाव राष्ट्रपति के बारे में था। पहले सारी कार्यकारी शक्तियां राष्ट्रपति में ही निहित थीं। 42 वें संशोधन में कहा गया है कि राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह से ही काम करना होगा, जो आज भी है।

3. 44 वां संषोधन:- संपत्ति मूल अधिकार से बाहर
1978: संपत्ति मूल अधिकार पहला महत्वपूर्ण संशोधन था। जमींदारी उन्मूलन और संपत्ति के अधिकार को लेकर लंबे समय तक न्यायपालिका और विधायिका के बीच रस्साकशी चली थी। जमींदारी उन्मूलन के संबंध में जो कानून संसद ने बनाया था, उसे न्यायपालिका ने निरस्त कर दिया। इसके बाद संविधान में संशोधन किया गया। फिर भी न्यायपालिका को स्वीकार्य नहीं हुआ, तो कई संशोधन करने पड़े, जिनमें पहला , चैथा, 17 वां, 29 वां, 34 वां, आदि संशोधन है आखिर 1978 में 44 वें संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों के अध्याय से निकाल दिया गया।

4. 52 वां संषोधन:- दल बदल के खिलाफ
1985: इसके जरिए संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसे दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। इसमें दल बदलने वालों की सदस्यता समाप्त करने का प्रावधान किया गया।

5. 73 वां संषोधन:- पंचायती राज व्यवस्था के लिए
1992: 73 वां और 74 संशोधन से पंचायती राज व्यवस्था आई। नगर पालिकाओं और पंचायतो ंको संवैधानिक दजौ दिया गया। और प्रावधान किया गया कि इन्हें 6 महीने से अधिक समय के लिए निलंबित नहीं रखा जा सकता।

6. 86 वां संषोधन:- षिक्षा बना मूल अधिकार
2002: इस संविधान संशोधन के माध्यम से छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार लाया गया।संविधान आयोग ने सिफारिश की थी कि शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार माना जाए, लेकिन संशोधन में ऐसा सिर्फ 6 वर्ष से 14 वर्ष तक की आयु के लिए किया गया।

7. 91 वां संषोधन:- मंत्रियों की संख्या पर नियंत्रण
2004: इसके माध्यम से केंद्र और राज्यों में मंत्रियों की संख्या पर अंकुश लगाया गया। तय किया गया कि मंत्रियों की संख्या निम्न सदन के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। इसके पहले कुछ राज्यों में ऐसा हो रहा था कि विधानसभा में कुल सदस्यों की संख्या तो 60 है और इसमें से 49 को मंत्री बना दिया गया। बाकी को भी मंत्री के समकक्ष दर्जा देकर पद दे दिया गया।इसे रोकने के लिए संविधान आयोग की सिफारिश पर यह संशोधन लाया गया।

8. 93 वां संषोधन: ओबीसी को कोटा मिला
2006: इसके माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 15 में बदलाव करके सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ो को शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। पहले यह प्रावधान सिर्फ एससी-एसटी और एंग्लों इंडियंस के लिए था। इस संशोधन के जरिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को यह सुविधा दी गई।

9. 99 वां संषोधन: ज्यूडिषियल कमीषन बनाया
2014: यह बहुत महत्वपूर्ण संशोधन था, जिसके द्वारा नेशनल ज्यूडिशियल अपाॅइ्रटमेंट कमीशन का प्रावधान किया गया। दुनिया में कोई देश ऐसा नहीं है, जहां जज अपने ही ब्रदर जज को खुद चुनते हों, लेकिन हिंदुस्तान में यह व्यवस्था थी और अभी भी है। इसमें जजों को जजोें के काॅलेजियम द्वारा ही चुना जाता है, इसी में सुधार के लिए 99 वां संशोधन लाया गया। लेकिन जब मामला अदालत के सामने पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया।

अहम संषोधन

61 वां संषोधन:-
1989 में इस संशोधन से मताधिकार की आयु 21 वर्ष से कम करके 18 वर्ष की गई थी।

101 वां संषोधन:-
2017 में गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स (जीएसटी) को लागू करने के लिए 101 वां संविधान संशोधन किया गया।

103 वां संषोधन:-
2019 में संपन्न संसद के सीतकालीन सत्र में अंतिम संशोधन आर्थिक रूप से पिछड़ों को आऱक्षण्पा देने के लिए किया गया है।

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