मृदा संसाधन

भारतवर्ष के हृदय में बसा छत्तीसगढ़ प्रदेश भारतवर्ष के दक्षिण पठार का हिस्सा है। जहाॅं बहुत बड़े हिस्से में अवशिष्ट मिट्टी पायी जाती है सामान्य रूप् से जनक चट्टानें ही यहाॅं की मिट्टी का निर्धारण करती है।
छत्तीसगढ़ प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में जल विकास उत्तम है। अत्यंत प्राचीन भू-खंड वाले इस प्रदेश में मिट्टी का निर्माण और उसमें परिवर्तन लगातार जारी है यह भी कहा जाता है।कि देशभर में सबसे प्रौढ़ मिट्टी छत्तीसगढ़ में पायी जाती है छत्तीसगढ़ प्रदेश की मिट्टी के इतिहास के आधार पर कहा जा सकता है कि यह प्रदेश अत्यधिक प्राचीन भू-खंड का भाग है। साथ ही यहाॅं कि मिट्टी को विकास हेतु प्र्याप्त समय अथवा काल मिल चुका है वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो प्रदेश में मिट्टी का व्यस्थित सर्वेक्षण अब तक नहीं हो पाया है अतः केवल बड़े भू-भागों में ही इनके वितरण की जानकारी मिल पा रही है।

                                                                                छत्तीसगढ़ की मिट्टीयाॅं
मृदा या मिट्टी एक प्राकृतिक संसाधन है। मृदा प्रकृति की एक अमूल्य धरोहर है। मृदा ही किसी भी क्षेत्र की समृद्धि का आधार होता है। छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य हैं। इस कारण छत्तीसगढ़ के सामाजिक आर्थिक विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। धरातल की उपरी परत मृदा है। मृदा अवशिष्ट चट्टान खनिज पदार्थ तथा जीवाश्म का समूह है मृदा का निर्माण दीर्ध काल में वर्षा, नदी ,पवन, आदि प्राकृतिक कारणों से होता है।क्षेत्र विशेष की जलवायु मौलिक चटट्नो वनस्पति की मात्रा जल निकास आदि कारणों से होता है । क्षेत्र विशेष की जलवायु मौलिक चट्टानों वनस्पति की मात्रा जल निकास आदि कारकों से मृदा के स्वरूप् में प्रादेशिक आधार पर भिन्नता पायी जाती है। भौतिक संरचना में भिन्नता के कारण छत्तीसगढ़ प्रदेश के भौतिक प्रदेशों में अलग-अलग मृदा पायी जाती है। संगठन संरचना रंग तथा गुण के आधार के पर छत्तीसगढ़ में मृदा को निम्नलिखित वर्गों में बाॅंटा गया है।

छत्तीसगढ़ में मृदा
1. लाल-पीली मिट्टी
2. लाल-बलुई
3. काली
4. लैटेराइट-लाल
5. मिश्रित दोमट

1. लाल-पीली मिट्टी-
छत्तीसगढ़ में इसका स्ािानीय नाम मटासी है। छत्तीसगढ़ राज्य में सर्वाधिक क्षेत्रफल में इस मिट्टी का विस्तार है राज्य में 55-60 प्रतिशत भाग पर यह मिट्टी पायी जाती है पूर्वी बघेलखंड का पठार, जशपुर-सामरी पाट प्रदेश तथा महानदी बेसिन के अधिकांश भाग में यह मिट्टी पायी जाती है।
अपरदित गोंडवाना तथा कड़प्पा चट्टानों से इस मिट्टी का निर्माण होता है इस मिट्टी में आयरन आॅक्साइड की प्रधानता होती है फेरस आॅक्साइड के कारण लाल रंग तथा फेरिक आॅक्साइड के कारण पीला रंग होता है चूने की मात्रा पर्याप्त होती है लाल पीली मिट्टी का पी.एच. मान 5.8-8.4 के मध्य होता है।
इस मिट्टी में एलूमिना की मात्रा कम तथा बालू की मात्रा ज्यादा होती हहै इसी कारण इसकी प्रकृति थोड़ी बलुई होती है। जिसके कारण इसकी जलधारण क्षमता मध्यम होती है इसमें नाइट्रोजन फाॅस्फोरस तथा ह्यूमस की कमी होती है इस कारण इस मिट्टी की उर्वरता भी कम होती है इस मिट्टी में चावल मिट्टी की संज्ञा दी जाती है अन्य फसलों में तंबाकू दलहन तथा तिलहन के लिए प्रमुख होती है।

2. लाल-बलुई मिट्टी-
छत्तीसगढ़ राज्य के 20-25 प्रतिशत भाग पर इसका विस्तार है। दण्डकारण्य प्रदेश में बस्तर कोण्डागांव दंतेवाड़ा नारायणपुर तथा बीजापुर में इसका विस्तार है।
आर्कियन्स तथा धारवाड़ इस मिट्टी की मौलिक चट्टान है। आयरन आॅक्साइड की अधिकता के कारण इस मिट्टी का रंग लाल होता है इस मिट्टी में बालू, क्ले तथा कंकड़ की मात्रा ज्यादा होती है, जिसके कारण इसकी जलधारण क्षमता कम होती है नाइट्रोजन फाॅस्फोरस चूना ह्यूमस की मात्रा कम होती है जिसके कारण इसकी उर्वरता बहुत कम होता है।

3. काली मिट्टीः-
प्रदेश में पायी जाने वाली काली मिट्टी में लोहे और चूने की मात्रा मुख्य रूप् से पायी जाती है। यही कारण है कि इसका रंग काला होता है। वस्तुूतः काली मिट्टी बेसाल्ट नामक आग्नेय चट्टान के ऋतुक्षरण से बनी है मिट्टी विशेषज्ञों का मानना है कि बेसाल्ट के ऋतुक्षरण के पश्चात् लोहे के कणों का आॅक्सीकरण होता है और उसका रंग लाल हो जाता है लाल रंग में परिवर्तन के बाद लगातार रासायनिक परिवर्तन तथा मृतिका के एकत्र होने के कारण मिट्टी का रंग काला हो जाता है। यह गठन से दोमट अथवा चिकनी होती है पानी पड़ने पर इस मिट्टी का रंग काला हो जाता है। यह गठन से दोमट अथवा चिकनी होती है पानी पड़ने पर इस मिट्टी के चिपकने का कारण भी यही है साथ ही इस मिटटी के सूखने पर यह फअने लगती है अथवा उसमें दरारें आने लगती है।
वर्षा काल में इसमें हवा के प्रवाहित होने एवं पानी के रिसने की समस्या उत्पन्न होती है काली मिट्टी में नाइट्रोजन फास्फोरस तथा जैव तत्वों की मात्रा कम होती है इस मिट्टी की प्रवृत्ति क्षारीय गुण लिए होती है। हमारे प्रदेश में यह मिट्टी कन्हारी मिट्टी के नाम से जानी जाती है।
लोहे के अंश अधिक हेाने से काली होती है। कैल्शियम, मैग्नीशियम और चूना पर्याप्त मात्रा में होती है। गर्मी में लम्बी दरारें पड़ने के कारण इसमें सूर्य प्रकाश और हबा गहराई तक पहुॅचती है। इस कारण यह अधिक उपजाउ होती है।

4. लाल – देामट मिट्टी-
यह मिट्टी भी लाल आॅक्साइड के कारण लाल रंग लिए होती है रेत के अनुपात में क्ले की मात्रा अधिक होने के कारण इसे दोमट मिट्टी की संज्ञा दी गयी है। इस मिट्टी वाली जमीन पर फसल अधिक लेने के उददेश्य से अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है कारण यह है कि इस प्रकार की मिट्टी में आद्रता की मात्रा बहुत ही कम होती है। इस मिट्टी की प्रकृति अम्लीय होती है। इसका निर्माण नीस, डायोराइट आदि चीकाप्रधान व अम्लरहित चट्टानों द्वारा होता है।

5. लेटेराइट मिट्टी-
छत्तीसगढ़ के रहवासी अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में निवासरत तथा खेती किसानी क धंधे से जुड़े लोगों द्वारा इसे स्ािानीय भाषा में भाठा जमीन कहा जाता है। इस मिट्टी का रंग भी लाल होता है इस प्रकार की मिट्टी में कंकड़ बहुतायत में मिली जाती है जल का बहाव निरंतर होते रहने से इस प्रकार की मिट्टी अपनी उर्वरा शक्ति खो देती है। लेटेराइट मिट्टी में आयरन एलयूमिनियम से संबंधित आॅक्साइड पाए जाते है। इस मिट्टी में मिला चूना निक्षालन के कारण नीचे चला जाता है। जो बहुत अधिक गहराई में मिल सकता है प्रकृति में कड़ा होने के कारण यह मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वेां का भी अभाव होता है।
इस मिट्टी का विस्तार प्रदेश के उच्च भागों में मुख्यतः सामरी सीतापुर अंबिकापुर बगीचा बिलासपुर चाम्पा रायपुर तिल्दा पाटन आदि तहसीलों में देखा जा सकता है। महत्वपूर्ण फसलों के मान से यह मिट्टी या इस प्रकार की मिट्टी वाली जमीन को अनुपयुक्त माना जाता है इस प्रकार की मिट्टी वाली कृषि भूमि में मोटे अनाज ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी,तिलहन आदि उगाए जा सकते है।
छत्तीसगढ़ प्रदेश में पायी जाने वाली मिट्टियाॅं भिन्नता लिए हुए है। यह भी कहा जा सकता है कि प्रदेश की मिट्यिाॅं भौतिक बनावट व मोटाई के आधर पर कृषि एवं उसके प्रादेषिक वितरण को प्रमुखता के साथ प्रभावित कर रही है। धान की फसल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त जमीन प्रदेष के विभिन्न हिस्सों में पाए जाने के कारण इस प्रदेश में धान का विपुल उत्पादन लिया जा रहा है। मानसून के अधिक सक्रिय न होने पर भी अन्य राज्यों की तुलना में धान का उत्पादन छत्तीसगढ़ में संतोषप्रद है । छत्तीसगढ के उॅंचाई वाले प्रदेशों में विस्तार है इसे भवन निर्माण मिट्टी भी कहा जाता है।

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