विकास की सामान्य विशेषाएॅं (General Characteristics of Development)

मनुष्य के विकास के विभिन्न पहलू होते हैं, फिर भी उन सभी को ध्यान से देखने पर कुछ सामान्य विशेषताएॅं उनमें पायी जाती हैं। इन विशेषताओं को नीचे दिया जा रहा हैं-

(1) विकास एक प्रतिदर्श का अनुसरण करता है- प्राणी के शारीरिक एवं मानसिक विकास में एक निश्चित क्रम पाया जाता है। हर जीवन अपनी जाति की विशेषताओं के अनुरूप् ही बढ़ता है। जैसे पशु का बच्चा जल्दी चलने-फिरने लगता है लेकिन मनुष्य का बच्चा 1-11/2 साल में ही चलता-फिरता है। इसी तरह मनुष्य पहले बोलता है बाद में लिखना-पढ़ना-गणित करना सीखता है। अतएव स्पष्ट है कि हरेक परिवर्तन और विकास अवस्थानुकूल होता है और एक प्रतिदर्श (Pattern) में होता है।

(2) विकास मेकं समानता होती है- प्रत्येक प्राणी जन्म लेता है, तदनन्तर शिशु, बाल्य और किशोर की अवस्था प्राप्त करता है। प्राणी चाहे पशु हो या मनुष्य सभी में विकास की अवस्थाएॅं समान रूप से पायी जाती हैं।

(3) विकास में भिन्नता होती है- प्रत्येक प्राणी दूसरे से भिन्न होता है, इसीलिए विकास में भी भिन्नता पायी जाती है। हरेक मनुष्य और पशु में भी व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं का विकास भिन्न मात्रा में होता है। हरेक अपने व्यक्तिगत आन्तरिक शक्ति और पर्यावरण के अनुसार विकास करता है।

(4) विकास आयु से सम्बन्धित होता है- आयु के बढ़ने के साथ-साथ व्यक्ति का विकास होता है। इस प्रकार आयु के अनुसार विकास में कुछ आगे, कुछ पीछे एवं अधिकतर सामान्य हुआ करते है। जिन्हें क्रमशः प्रतिभाशाली, पिछड़े एवं सामान्य प्राणी कहा जाता है।

(5) विकास में स्थायित्व होता है, निरन्तरता होती है- विकास कुछ तक होकर स्थिर हो जाता है जिससे कि पुष्टिकरण हो जाये। परन्तु विकास रूकता नहीं वह निरन्तर चलता रहता है। इससे लगातार परिवर्तन हुआ करता है।

(6) विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है- विकास पहले सामान्य एवं समष्टि रूप् से होता है जैसे शिशु पहले उठने में अपने सभी अंगों पर बल देता है, बाद में वह हाथ-पैर के सहारे उठता है।

(7) विकास की प्रत्येक अवस्था के विशेष लक्षण होत हैं- विकास की कई अवस्थाएॅं है, जैसे- शैशव, बाल्य, किशोर, युवा, प्रौढ़ एवं वृद्ध। इनमें से हरेक के अपने विशेष लक्षण होते हैं। जैसे शिशु में चलपता अधिक होती है, वृद्ध सुस्त, धीमें काम करने वाला होता हैं, किशोर में आॅंधी-तूफान सदृशय क्रियाशीलता एवं संवेगशीलता होती है। प्रौढ़ में अधिक समझदारी एवं स्थिर वृद्धि होती है।

(8) शरीर के विभिन्न अंगों की विकास दर भिन्न होती है- प्राणी के सिर, धड़ और सभी अन्य अवयवों के विकास की गति एक ह दर से नहीं होती है। उदाहरण के लिए सिर का विकास पहले ही होता है बाद में अन्य अंगों का मस्तिष्क सात-आठ वर्ष में ही पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है जबकि हाथ-पैर युवावस्था तक परिपक्व एवं पुष्ट होते है। इससे विकास दर में भिन्नता पायी जाती है।

(9) विभिन्न प्रकार का विकास परस्पर सहसम्बंधित होता है- व्यक्ति के शारीरिक, बौद्धिक, संवेगात्मक, नैतिक, सौंदर्यात्मक आदि विकास अलग-अलग होते हैं फिर भी उनमें सहसम्बन्ध पाया जाता है। जैसे मस्तिष्क की रचना के अनुसार ही मानसिक शक्तियों बढ़ती रहती हैं। व्यक्ति समाज में अनुकूलन भी इसी विकास की सहायता से करता है। उसे अच्छे-बुरे, सुन्दर और असुन्दर का ज्ञान भी इसी तरह से होता है। इससे स्पष्ट है कि विभिन्न प्रकार के विकास में एक पारस्परिक सह-सम्बन्ध पाया जाता है।

(10) विकास से सम्बन्धित व्यक्ति की भिन्नता स्थिरता होती है- यदि किन्ही दो व्यक्तियों में किसी प्रकार की भिन्नता शुरू में पायी जाती है तो वह भिन्नता बाद की अवस्था में भी उसी प्रकार पायी जाती है। इससे स्पष्ट है कि व्यक्तिगत भिन्नता स्थिर हुआ करती है।

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