विकास के रूप (Kinds of Development)

व्यक्ति के विकास के कई रूप एवं पहलू पाए जाते हैं। प्रायः व्यक्तित्व के कई पक्ष होने से और उनके विकास होने से ही विकास का रूप भी हमें कई प्रकार का दिखाई देता है। नीचे हम विकास के विभिन्न रूपों की ओर संकेत करेंगे जिनका अध्ययन आज मनोवैज्ञानिक लोग करते हैं-
(1) शारीरिक विकास- इसका सम्बन्ध व्यक्ति के शारीरिक अंगों से होता है जैसे आकार, भार, लम्बाई और अंगों की क्रियाशीलता का विकास।

(2) मानसिक विकास- इसमें हम संवेदन, प्रत्यक्षण, निरीक्षण, स्मरण, कल्पना, चिन्तन, निर्णय, तर्क, बुद्धि आदि की क्रियाओं से सम्बन्धित विकास को शामिल करते हैं।

(3) संवेगात्मक विकास- प्राणी अपने पर्यावरण के प्रभावस्वरूप कुछ अनुभूति करता है जो स्वभाविक होता है। इसके फलस्वरूप उसमें संवेगात्मक विकास होता है।

(4) नैतिक विकास- मनुष्य में गुण-अवगुण पहचानने एवं उन्हें अलग करने का विवके होता है। फलस्वरूप अच्छी चीजों के लिए उसमें स्थायी भाव, मान्यता, आदर्श-स्थापना के गुण पाये जाते हैं। यही उसका नैतिक विकास कहलाता है।

(5) चारित्रिक विकास- जब नैतिकता को अपने आचरण में मनुष्य प्रकट करता है तो वह उसका चरित्र कहा जाता है। इन्हीं का लगातार प्रकाशन चारित्रिक विकास है।

(6) सामाजिक विकास- व्यक्ति जन्म तो अकेले लेता है परन्तु उसका विकास दूसरों के सम्पर्क में होता है। अतएव वह समाज के साथ चलता-फिरता-बढ़ता है। जब दूसरे के साथ वह समायोजन कर लेता है तो उसमें सामाजिक गुण आ जाता है और इस तरह से दूसरों के साथ मिल-जूलकर रहने, काम करने से व्यक्ति का सामाजिक विकास होता है।

(7) सौंदर्यात्मक विकास- व्यक्ति सुन्दर को ही पसन्द करता है और सुन्दर वस्तु की प्रशंसा करता है। जीवन में सुन्दर वस्तु, व्यवहार आदि का लगातार प्रयोग करने से व्यक्ति मेकं सौंदर्यात्मक (Aesthetic) विकास होता है।

(8) आध्यात्मिक विकास- व्यक्ति में एक आत्मा (Soul or self)पायी जाती है जो सूक्ष्म होती है और अदृश्य रूप में आन्तरिक प्रेरणा देती है जिससे व्यक्ति हमेशा अच्छाई की ओर लगता है। खोज में प्रयत्नशील होती है तो मनुष्य का आध्यात्मिक विकास होता है।

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