1.शारीरिक विकास (PHYSICAL DEVELOPMENT)

 बालक के विकास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शारीरिक विकास है

शारीरिक विकास का प्रभाव – मानसिक विकास पर
समाजिक विकास पर
सांवेगिक विकास पर
इन सभी विकासों पर पड़ता है।
इसीलिए शैक्षिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण विकास शारीरिक विकास है। गति एवं प्रकृति की दृष्टि से बालक के विकास की विभिन्न अवस्थाओं में शारीरिक विकास की विभिन्नता का अध्ययन शैक्षित प्रगति के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है।

(i) जन्म एवं शारीरिक विकास (PRENATAL PHYSICAL DEVELOPMENT)
ज्योंही शुक्राणु के साथ मिलकर अण्ड (Egg) निषेचित होता है त्यों ही मानव जीवन प्रारम्भ हो जाता है। निषेचित अण्ड सर्वप्रथम दो कोषों में, पुनः प्रत्येक कोष दो-दो कोषों में विभाजित हो जाता है। उसी प्रकार प्रत्येक नया कोष दो भागों में विभाजित होता जाता है। कोष विभाजन की यह प्रक्रिया अत्यन्त तीव्र गति से होती है।
शरीर कोषों से मांसपेशियाॅं, स्नायु, मण्डल, तथा शरीर के अन्य भागों का निर्माण होता है।
निषेचन (Fertilization) से जन्म तक का समय जन्मपूर्व काल (Pre Natal Period) या जन्म पूर्व विकास का काल कहलाता है।
सामान्यतः जन्म पूर्व काल 40 सप्ताह अथवा 280 दिन का होता है। जन्म पूर्व काल के 280 दिनों में निषेचित अण्ड का आकार पचास हजार गुणा तथा भार 1 ग्राम के पाॅंच हजारवें भाग से बढ़कर 31/2 किलो तक हो जाता है।
जन्मपूर्वकाल तीन काल खण्डों में बॅंटा है:

1.डिम्बावस्था (Period of ovum)ः- यह जन्म पूर्व काल का प्रथम काल है। यह अवस्था 2 सप्ताह तक चलती है। डिम्बावस्था में निषेचित अण्ड बाहर से लगभग नही ंके बराबर पोषण पाता है। यह अण्ड में उपस्थित भोजन (Yolk) से ही पोषित होता है।
इस समय यह माता से भी नहीं जुड़ा होता। यह एक मुक्त रूप से विचरण करने वाला कण (Free Floating Particle) होता है।
निषेचित अण्ड तीव्रगति से विभक्त एवं पुनर्विभक्त होता रहता है। कोष के अन्दर विद्यमान प्रत्येक वंश सूत्र लम्बाई में इस प्रकार से विभक्त होता है कि प्रत्येक नए कोष में पुराने कोष के समस्त पित्रैक (Gencs) उपस्थित रहते है।
निषेचन के लगभग 10 दिन के उपरान्त निषेचित अण्ड गर्भाशय (Uterus) की दीवार पर स्थापित होने के लिए उपयुक्त स्थान पा लेता है तथा अपने स्पर्श अंगों (Uterus) को गर्भाशय की दीवार में चुभोकर गर्भाशय की सतह की रक्त नलिकाओं (Bolld Vessels) से अपना संबंध जोड़ लेता है।
इस प्रकार से निषेचित अण्ड अपने पोषण का एक नया स्त्रोत बना लोता है।
निषेचित अण्ड द्वारा गर्भाशय की दीवार से अपना संबंध जोड़ने की प्रक्रिया को आरोपण (Implantation) कहते हैं।
आरोपण हो जाने के बाद संयुक्त कोष एक परजीवी (Parasite) हो जाता है।
जन्मपूर्व अवधि का बाकी समय वह इसी अवस्था में व्यतीत करता है।

डिम्बावस्था तीन कारणों से महत्वपूर्ण है:-
(1) निषेचित अण्ड गर्भाशय में आरोपित होने से पूर्व निष्क्रिय हो सकता है।
(2) निषेचित अण्ड गलत स्थान पर आरोपित हो जाए।
(3) निषेचित अण्ड का आरोपण सम्भव ही न हो। यदि अण्ड में भोज्य पदार्थ (Yolk) इतना कम-हो कि आरोपण से पूर्व समाप्त हो जाए तो निषेचित अण्ड निष्क्रिय हो जाता है।

मता की पीयूष ग्रन्थि (Pitutary gland) एवं थाइराइड ग्रन्थि (Thyroid gland) निकलने वाला हारमोन (Harmones) निषेचित अण्ड को (लम्बें समय तक) आरोपित नही होने देता अतः इनका स्राव संतुलित होना चाहिए। आरोपण में विलम्ब के कारण निषेचित अण्ड अगले मासिक धर्म (Mensturation) में बाहर हो जाता है।
कभी-कभी निषेचित अण्ड ऐसे स्थान पर आरोपित हो जाता है जहाॅं पोषण न मिलने के कारण निष्क्रिय होकर मर जाता है।
कभी-कभी निषेचित अण्ड गर्भाशय में जाने से पूर्व फालोनियन नही (Follopian Tube) की दीवार पर आरोपित हो जाता है जहाॅं इसका सामान्य विकास नहीं हो पाता।
कभी-कभी यह गर्भाशय की दीवार के किसी छोटे तन्तुनुमा ट्यूमर (Small Fibroid Tumor) पर आरोपित हो जाता है तब भी इसे पोषण नहीं मिल पाता।

डिम्बावस्था के दौरान तीन बातें महत्वपूर्ण हैं:-
1.निषेचित अण्ड में पर्याप्त मात्रा में भोज्य पदार्थ (Yolk) होना आवश्यक है।
2.माता की पीयूष ग्रन्थि एवं थायराइड ग्रन्थि तथा गर्भाशय की क्रियाशीलता के मध्य उचित तालमेल होना चाहिए।
3.संयुक्त कोष या निषेचित अण्ड अपने आपको उचित स्थान पर आरोपित करे।

 

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