1.शारीरिक विकास (PHYSICAL DEVELOPMENT) (3) भ्रूणावस्था (Period of Fetus)

भ्रूणावस्था (Period of Fetus)

न्वें सप्ताह से 40 वें सप्ताह की काल भ्रूर्णावस्था है। तीनों कालों (जन्म पूर्व विकास के कालों) यह में यह सबसे लम्बा काल है। किन्तु अन्य कालों की तुलना में यह कम महत्वपूर्ण काल है। विकास की गति पूर्व अवस्थाओं की तुलना में कम होती है।
आकार में वृद्धि एवं आनुपातिक आकार में परिवर्तन इस काल की विशेषता है।

भ्रुणावस्था में शरीर के अंगों में अनुपात

शरीर के अंग                     8 सप्ताह का भ्रूण                  20 सप्ताह                    40 सप्ताह
सिर का क्षेत्र                      45 प्रतिशत                           35 प्रतिशत                   25 प्रतिशत
धड़ का क्षेत्र                      35 प्रतिशत                            40 प्रतिशत                  40 प्रतिशत
पैरों का क्षेत्र                      20 प्रतिशत                            25 प्रतिशत                  35 प्रतिशत

भ्रुणावस्था का महत्व –

(i) पाॅंच महीने तक गर्भपात की संभावना
(ii) विकास की प्रतिकूल परिस्थिति का बालक के विकास पर प्रभाव
(iii) विकास की प्रक्रिया मे उचित तालमेल न होने से अपरिपक्व प्रसव
(iv) भ्रूणावस्था की परिस्थिति से सरल एवं जटिल प्रसव (Delivery)

जन्मपूर्व शारीरिक विकास का महत्व-

1.कुपोषण से बालक के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अतः माता को पौष्टिक भोजन उपलब्ध करना आवश्यक होता है। गर्भस्थ शिशु मादक पदार्थों (Toxins) के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होता हे अतः माता को चाय, काॅफी, सिगरेट, अफीम, निकोटिन एवं इवाइयों से यथासंभव दूर रखना चाहिए।

3.सांवेगिक सदमों, अपेक्षित शारीरिक व्यायाम का अभाव एवं तंग कपड़े पहनने से बालक के उचित विकास में बाधा पड़ती है अतः माता को अपेक्षित सुरक्षा एवं व्यायाम आवश्यक है।

4.इस अवधि में माता को संक्रामक रोगों से दूर रहना आवश्यक होता है। कुछ रोग जैसे सिफलिस (Siphlrs), टायफायड (Typhoid), डिप्थीरिया (Diphtheria) वंशानुगत नहीं होते। किन्तु जन्म के समय यवि माता इनसे प्रभावित होती है तो उससे ये रोग बालक में आ जाते हैं, जिन्हें वंशानुगत नहीं सहजन्म रोग कहा जाता है। अतः माता को इन रोगों से बचाना चाहिए।

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